आयु पचपन की होने के बावजूद मन बचपन का हो जाता है।


आयु पचपन की होने के बावजूद मन बचपन का हो जाता है।
गगन मंच संवाददाता 
*बचपन से पचपन तक , 
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 _-राजेश बैरागी-_ 
चूंकि मैं किसी उच्च कुल अथवा राजपरिवार में नहीं जन्मा था , इसलिए मेरे भाग्य और भविष्य को लेकर भी कोई ठोस राय नहीं बनाई जा सकती थी।जैसा मैंने अपने पचास वर्ष का होने पर लिखा था कि मैं एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्मा था। मेरे पिता किसी विद्यालय से शिक्षित न होने पर भी अद्भुत प्रतिभा के धनी थे।उनका अधिकांश जीवन निर्धनता में रहा, परंतु उनपर इसका कोई प्रभाव नहीं था। वो मन से शासक, स्वभाव से तानाशाह और अपने बच्चों के प्रति अत्यंत प्रेम रखने वाले पिता थे। उन्हें साहित्य, फिल्म, राजनीति, हिसाब-किताब का गहरा ज्ञान था। वो कभी किसी को कुछ दान करने की स्थिति में नहीं रहे परंतु किसी से कुछ लेना भी उनके स्वभाव में नहीं था। उनके चरित्र की इन विशेषताओं ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया। मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैं जो कुछ भी हूं उसमें केवल दस प्रतिशत मेरा है, नब्बे प्रतिशत मेरे पिताजी का है। अपने जीवन की इस यात्रा में मैं अधिकांशतः पैदल चला हूं। इससे मार्ग के आनंद और कठिनाईयों से बखूबी परिचित हो पाया। घरेलू जिम्मेदारियों ने बचपन में ही वयस्क बना दिया था इसलिए वयस्क होने का कभी पता नहीं चला। शादी, बच्चे, फिर 2014 में बेटी की शादी, सबकुछ जैसे यंत्रवत होता गया। मुझे सौभाग्य से अच्छी जीवनसाथी मिली। मेरी बेटी और दामाद मेरे जीवन रथ के दो सशक्त अश्व जैसे हैं। एक नातिन है जो मेरे लिए सजीव खिलौना भी है और प्रेरणा भी है। पिता नहीं रहे हैं परंतु सीधी-सादी मां का साया मेरे सिर पर विद्धमान है।जीवन का अर्धशतक लगाने के साथ अपने से आधी आयु के बच्चों को स्वत: ही बेटा और बेटी कहना आ गया। अब बेटे की शादी करने और उसकी जीवन संगिनी के साथ साथ अपने लिए एक बेटी को घर लाने की इच्छा बलवती होने लगी है। ईश्वर ने यह आरज़ू भी पूरी करने की तैयारी कर दी है। अगले महीने 26 फरवरी को बेटे की शादी का शुभ मुहूर्त बना है। जीवन के उत्तरार्ध में अगली पीढ़ी को पूर्णता की ओर जाते देख कैसा अनुभव होता है?आयु पचपन की होने के बावजूद मन बचपन का हो जाता है। क्या मैं ऐसा ही अनुभव कर रहा हूं?जी हां मैं आज पचपन वर्ष का हो गया हूं।(नेक दृष्टि)

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